हो उद्देश्य चाहे वृहत या फिर बहुत अनुदार
डगर जब चुनने का समय आ जाए सामने
होते हमेशा साथ हमारे दो ही विकल्प
जिनकी चमक से चुँधिया जाते हैं हमारे
संकल्प
चाहे तो हम कर सकते हैं चुनाव कुछ अल्पमार्गों
का
हो जाएगी राहें छोटी और पा जायेंगे कुछ
मकसदों को जल्द ही
पर क्या सिर्फ समय ही हो सकता है सफलता
का सूचक
क्या खोया क्या पाया क्या नहीं है ये
कोई भी मसला
क्या होगा हमें फिर वो फ़क्र खुद पर
गर न बन सके कल के खुद से ही बेहतर इंसा
गर हम कुछ नया सीख ही न पाए इस सफर में
गर हम न बन पाए किसी और के अनुकरणीय
और क्या हम चाहेंगे अगली पीड़ी के भी उन्ही
राहों पे कदम
क्या हम कह पाएंगे खुद को सफल इन झूठे
पैमानों से!
और अगर कहीं उत्तर हो आपका "नहीं"
तो फिर हम क्यों नहीं चलते उन सफलता के
सिद्ध राहों पर
वही राहें जो लम्बी तो बेशक होती हैं
मगर
ले जाती हैं हाथ पकड़ उन सुकून की मंज़िलों
पर
जिसमे आप खोते नहीं पर पा जाते हैं खुद
को
पहले से कहीं बेहतर और पहले से कहीं ज्यादा
किफायती!
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