Friday, September 25, 2020

सफलता आखिर है क्या?

 

हो उद्देश्य चाहे वृहत या फिर बहुत अनुदार

डगर जब चुनने का समय आ जाए सामने

होते हमेशा साथ हमारे दो ही विकल्प

जिनकी चमक से चुँधिया जाते हैं हमारे संकल्प

चाहे तो हम कर सकते हैं चुनाव कुछ अल्पमार्गों का

हो जाएगी राहें छोटी और पा जायेंगे कुछ मकसदों को जल्द ही

पर क्या सिर्फ समय ही हो सकता है सफलता का सूचक

क्या खोया क्या पाया क्या नहीं है ये कोई भी मसला

क्या होगा हमें फिर वो फ़क्र खुद पर

गर न बन सके कल के खुद से ही बेहतर इंसा

गर हम कुछ नया सीख ही न पाए इस सफर में

गर हम न बन पाए किसी और के अनुकरणीय

और क्या हम चाहेंगे अगली पीड़ी के भी उन्ही राहों पे कदम

क्या हम कह पाएंगे खुद को सफल इन झूठे पैमानों से!

और अगर कहीं उत्तर हो आपका "नहीं"

तो फिर हम क्यों नहीं चलते उन सफलता के सिद्ध राहों पर

वही राहें जो लम्बी तो बेशक होती हैं मगर

ले जाती हैं हाथ पकड़ उन सुकून की मंज़िलों पर

जिसमे आप खोते नहीं पर पा जाते हैं खुद को

पहले से कहीं बेहतर और पहले से कहीं ज्यादा किफायती!

Sunday, September 13, 2020

बख़ूबी याद है पापा


बचपन से ही माँ की डांट से बचने के लिए आपके पीछे छुप जाना 

और आपका मेरे सारे इल्ज़ाम अपने सर ले लेना 

बख़ूबी याद है पापा आपका हर बार साथ देना


school  जाने के हमारा तैयार हो जाना

पर फिर भी किसी बहाने से आपका school gate तक छोड़ने आना 

बख़ूबी याद है पापा आपका हर बार परवाह करना


ढेर सा काम होने पर भी शाम को time पर office से आना

और आपका आते ही scooter पे एक चक्कर लगाना 

बख़ूबी याद है पापा आपका हमेशा वो मुस्कुराता चेहरा


थके हुए दिमाग से भी रोज़ पढाई करवाना 

समझ न आने पे धैर्य से बार बार समझाना

बख़ूबी याद है पापा आपकी वो मीठी धमकियां 


हमेशा school functions में शामिल होना 

और खिलखिलाते हुए तालियां बजाते रहना 

बख़ूबी याद है पापा मेरा बस आप पे ही नज़रें टिकाये रखना


पर भर के गुस्से से भी आपका हमें तक sorry बोल देना

और मनपसंद गानों पर झूम के गाते हुए dance करना 

बख़ूबी याद है पापा आपके हर भाव की पूर्ण अभिव्यक्ति


किसी से न डरना जब आप खुद के काम और बात सही हों

पर गलती हो जाने पे तुरंत दिल से माफ़ी मांग लेना

बख़ूबी याद याद है पापा आपकी हर शिक्षा


आपका हमारी ज़रूरतों को हर कीमत पे पूरा करना 

पर फिर भी ज़रुरत और लालसाओं में फरक सिखलाना 

बख़ूबी याद है पापा आपकी हर बुनयादी सीख


न बड़े छोटे का भेद और न बेटे बेटी का भेद करना 

अंतर हो सकता है राय में पर अभिव्यक्तियों पर कभी रोक न लगाना

बख़ूबी याद है पापा हमारी कई ऐसी चर्चाएं


वो आपका हमें गेंहू पिसवाने भेजना और electricity bill की लम्बी कतारों में लगवाना 

परी तो हर लड़की होती है अपने पापा की पर आपका हमें warrior बनना सिखाना

बख़ूबी याद है पापा आपका हमेशा एक अलग सोच रखना


आपके विचारों की स्वछंदता और निर्भीक फिर भी अदद लहज़ा 

आपके दिए परों से उड़ रहे हम सभी अपने गगन में आज

बहुत सारे पल हैं पापा जो कभी हम भुला नहीं सकते

और न ही कुछ चाँद पंक्तियों में उन्हें हैं व्यक्त करना मुमकिन 





Tuesday, August 11, 2020

स्वप्रेम

 चाहने वाले कई हैं तुम्हारे इस महफ़िल में, 

जाने क्यूँ नज़र नहीं आ पाते तुम्हें वो कभी 


खुद को खो देते हो उनकी खुशियों की आरजू में

जिन्हें न है तेरे सपनों का भान न ही तेरे दर्द का आभास 


अपने को भुला के लगे रहते हो उनके सपने संजोने में 

पर क्या सुनते हो कभी अपने दिल की इक भी दबी हुईआस


उनकी ख्वाइशें उनकी फरमाइशें बस बन गया तेरा मकसद

ये भी सही ऐ मेरे दोस्त, पर क्यों परेशां है तू जो वो फिर भी मुस्कुराते नहीं 


तूने तो सब कुछ कर दिया अर्पण जाने कितनी मुद्दतों पहले 

क्या भुला दिया तूने भी कि अपनी खुशियां अपने ही हाथों में हैं होती  


खूबियां हैं कई तुम में भी ऐ हसीं 

चाह कभी लो अपने को भी उन गैरों की तरह 


ना खुद को यूँ जलाया करो 

किसी और के लापरवाह साथों में 


हाँ बेशक फ़र्ज़ अपना निभाना ही है रिश्तों में 

पर क्या खुद को सज़ा-ए-तोहफा है मुनासिब?


पहचान अपनी चाहतें, अपने सपने

हो सकती है तेरी मंज़िल कहीं दूर


पर तू भी कहाँ है उन थकने वालों में

बस तेरा खुद पे है भरोसा काफी!

Monday, July 27, 2020

मेरी परछाई अक्सर मुझसे ये कहा करती है
सुन तू दिन की रोशनी और मेरे संग में इतना न खो जाना
कि जब रात आए तो अकेलेपन के खौफ़ में ही गुज़र जाये
और इस सज़ा में तुझे नयी सुबह का इंतज़ार भी न रह पाये

ऐ मेरे साये तू बस ठहर जा मेरे दिन के दायरों में
है वादा गुज़र जायेंगी अँधेरी रातें तेरी चाहों में..
जाने कब जागे थे इक सुकूँ भरी नींद से
मुददतें गुज़र गईं अब कुछ याद भी नहीं...