चाहने वाले कई हैं तुम्हारे इस महफ़िल में,
जाने क्यूँ नज़र नहीं आ पाते तुम्हें वो कभी
खुद को खो देते हो उनकी खुशियों की आरजू में
जिन्हें न है तेरे सपनों का भान न ही तेरे दर्द का आभास
अपने को भुला के लगे रहते हो उनके सपने संजोने में
पर क्या सुनते हो कभी अपने दिल की इक भी दबी हुईआस
उनकी ख्वाइशें उनकी फरमाइशें बस बन गया तेरा मकसद
ये भी सही ऐ मेरे दोस्त, पर क्यों परेशां है तू जो वो फिर भी मुस्कुराते नहीं
तूने तो सब कुछ कर दिया अर्पण जाने कितनी मुद्दतों पहले
क्या भुला दिया तूने भी कि अपनी खुशियां अपने ही हाथों में हैं होती
खूबियां हैं कई तुम में भी ऐ हसीं
चाह कभी लो अपने को भी उन गैरों की तरह
ना खुद को यूँ जलाया करो
किसी और के लापरवाह साथों में
हाँ बेशक फ़र्ज़ अपना निभाना ही है रिश्तों में
पर क्या खुद को सज़ा-ए-तोहफा है मुनासिब?
पहचान अपनी चाहतें, अपने सपने
हो सकती है तेरी मंज़िल कहीं दूर
पर तू भी कहाँ है उन थकने वालों में
बस तेरा खुद पे है भरोसा काफी!